अजा (जया) एकादशी



17. अजा (जया) एकादशी

भाद्रपद कृष्ण एकादशी


कुंतीपुत्र युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? व्रत करने की विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए।






मधुसूदन कहने लगे कि इस एकादशी का नाम अजा है। यह सब प्रकार के समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश की पूजा करता है उसको वैकुंठ की प्राप्ति अवश्य होती है। अब आप इसकी कथा सुनिए।

अजा (जया) एकादशी व्रत कथा:


प्राचीनकाल में हरिशचंद्र नामक एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। उसने किसी कर्म के वशीभूत होकर अपना सारा राज्य व धन त्याग दिया, साथ ही अपनी स्त्री, पुत्र तथा स्वयं को बेच दिया।



वह राजा चांडाल का दास बनकर सत्य को धारण करता हुआ मृतकों का वस्त्र ग्रहण करता रहा। मगर किसी प्रकार से सत्य से विचलित नहीं हुआ। कई बार राजा चिंता के समुद्र में डूबकर अपने मन में विचार करने लगता कि मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ, जिससे मेरा उद्धार हो।



इस प्रकार राजा को कई वर्ष बीत गए। एक दिन राजा इसी चिंता में बैठा हुआ था कि गौतम ऋषि आ गए। राजा ने उन्हें देखकर प्रणाम किया और अपनी सारी दु:खभरी कहानी कह सुनाई। यह बात सुनकर गौतम ऋषि कहने लगे कि राजन तुम्हारे भाग्य से आज से सात दिन बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा नाम की एकादशी आएगी, तुम विधिपूर्वक उसका व्रत करो।



गौतम ऋषि ने कहा कि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। इस प्रकार राजा से कहकर गौतम ऋषि उसी समय अंतर्ध्यान हो गए। राजा ने उनके कथनानुसार एकादशी आने पर विधिपूर्वक व्रत व जागरण किया। उस व्रत के प्रभाव से राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए।



स्वर्ग से बाजे बजने लगे और पुष्पों की वर्षा होने लगी। उसने अपने मृतक पुत्र को जीवित और अपनी स्त्री को वस्त्र तथा आभूषणों से युक्त देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुन: राज्य मिल गया। अंत में वह अपने परिवार सहित स्वर्ग को गया।



हे राजन! यह सब अजा एकादशी के प्रभाव से ही हुआ। अत: जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं।

इस एकादशी की कथा के श्रवण मात्र से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।


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एकादशी की पावन आरती


ऊँ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।

तेरे नाम गिनाऊँ देवी, भक्ति प्रदान करनी ।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।

ऊँ जय एकादशी…।।

मार्गशीर्ष के कृ्ष्णपक्ष में "उत्पन्ना" होती ।

शुक्ल पक्ष में "मोक्षदायिनी", पापों को धोती ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


पौष के कृ्ष्णपक्ष की, "सफला" नाम कहैं।

शुक्लपक्ष में होय "पुत्रदा", आनन्द अधिक लहैं ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


नाम "षटतिला" माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में "जया" कहावै, विजय सदा पावै ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


"विजया" फागुन कृ्ष्णपक्ष में शुक्ला "आमलकी" ।

"पापमोचनी" कृ्ष्ण पक्ष में, चैत्र  मास बल की ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


चैत्र शुक्ल में नाम "कामदा" धन देने वाली ।

नाम "बरुथिनी" कृ्ष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


शुक्ल पक्ष में होये"मोहिनी", "अपरा" ज्येष्ठ कृ्ष्णपक्षी ।

नाम"निर्जला" सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


"योगिनी" नाम आषाढ में जानों, कृ्ष्णपक्ष करनी ।

"देवशयनी" नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


"कामिका" श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण शुक्ला होय "पवित्रा", आनन्द से रहिए।। 

ऊँ जय एकादशी…।।

"अजा" भाद्रपद कृ्ष्णपक्ष की, "परिवर्तिनी" शुक्ला।

"इन्द्रा" आश्चिन कृ्ष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


"पापांकुशा" है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी ।

"रमा" मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।।

ऊँ जय एकादशी…।।


"देवोत्थानी" शुक्लपक्ष की, दु:खनाशक मैया।

लौंद मास में करूँ विनती पार करो नैया ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


"परमा" कृ्ष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।

शुक्ल लौंद में होय "पद्मिनी", दु:ख दारिद्र हरनी ।। 

ऊँ जय एकादशी…।।


जो कोई आरती एकाद्शी की, भक्ति सहित गावै ।

जन "गुरदिता" स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।।


ऊँ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। 


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