आमलकी एकादशी



6. आमलकी एकादशी

(फाल्गुन शुक्ल एकादशी)

फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी कहते हैं। आमलकी यानी आंवला को शास्त्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है। इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है।





आमलकी एकादशी व्रत के पहले दिन व्रती को दशमी की रात्रि में एकादशी व्रत के साथ भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए सोना चाहिए तथा आमलकी एकादशी के दिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए श्रीहरि मुझे अपनी शरण में रखें।



तत्पश्चात 'मम कायिकवाचिकमानसिक सांसर्गिकपातकोपपातकदुरित क्षयपूर्वक श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्तयै श्री परमेश्वरप्रीति कामनायै आमलकी एकादशी व्रतमहं करिष्ये' इस मंत्र से संकल्प लेने के पश्चात षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें।





भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें।



पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें। कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं।



अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें। रात्रि में भगवत कथा भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें।



भगवान विष्णु ने कहा है जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष में जो पुष्य नक्षत्र में एकादशी आती है उस एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है।


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एकादशी की पावन आरती



ऊँ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता



विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ऊँ।।

तेरे नाम गिनाऊँ देवी, भक्ति प्रदान करनी



गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ऊँ।।



मार्गशीर्ष के कृ्ष्णपक्ष की "उत्पन्ना" विश्वतारनी का जन्म हुआ।



शुक्ल पक्ष में हुई "मोक्षदा", मुक्तिदाता बन आई।। ऊँ।।



पौष के कृ्ष्णपक्ष की, "सफला" नामक है।

शुक्लपक्ष में होय "पुत्रदा", आनन्द अधिक रहै ।। ऊँ।।



नाम "षटतिला" माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।



शुक्लपक्ष में "जया" कहावै, विजय सदा पावै ।। ऊँ।।



"विजया" फागुन कृ्ष्णपक्ष में शुक्ला "आमलकी"



"पापमोचनी" कृ्ष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ऊँ।।



चैत्र शुक्ल में नाम "कामदा" धन देने वाली



नाम "बरुथिनी" कृ्ष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ऊँ।।

शुक्ल पक्ष में होये"मोहिनी", "अपरा" ज्येष्ठ कृ्ष्णपक्षी



नाम"निर्जला" सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी ।। ऊँ।।



"योगिनी" नाम आषाढ में जानों, कृ्ष्णपक्ष करनी



"देवशयनी" नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरी ।। ऊँ।।



"कामिका" श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।



श्रावण शुक्ला होय "पवित्रा", आनन्द से रहिए।। ऊँ।।



"अजा" भाद्रपद कृ्ष्णपक्ष की, "परिवर्तिनी" शुक्ला।



"इन्द्रा" आश्चिन कृ्ष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ऊँ।।

"पापांकुशा" है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी



"रमा" मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।।ऊँ।।



"देवोत्थानी" शुक्लपक्ष की, दु:खनाशक मैया।



लौंद मास में करूँ विनती पार करो नैया ।। ऊँ।।



"परमा" कृ्ष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।



शुक्ल लौंद में होय "पद्मिनी", दु: दारिद्र हरनी ।। ऊँ।।



जो कोई आरती एकाद्शी की, भक्ति सहित गावै



जन "गुरदिता" स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।।ऊँ।।



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